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Category: Swarna Bharat Party

Proposed training program on political liberalism and policy reform – August 2018

I’m planning to hold a two week training program (with 2 days in the middle for field visits) on political liberalism and public policy.

Potential dates: 13 August to 25 August 2018 (to be finalised), venue: the village library in Bhadohi district started by one of the founders of SBP.  Participants must be members of Swarna Bharat Party. Everyone must pay their own cost (including travel, lodging and food). I will be the sole “teacher” but the training will be held in an interactive/ open discussion format. I will ask questions and prompt the participants to search for the appropriate answer. The medium of instruction will be Hindi (but with a mix of English).

Prior to the attending the training, participants should have at least tried to read BFN, DOF and SBP manifesto. Participants are also advised to read at least some of Hayek’s, Mises’s and Milton Friedman’s works before the training program.

The program will (illustratively) include the following topics:

  • The history of economic development of the world and India’s predominant place for 18 out of the past 20 centuries
  • The meaning of individual freedom and the difference with the ideologies of collectivism
  • The history of the development of liberalism
  • The key requirements of a liberal society
  • Basics of the price system (invisible hand) and the use of knowledge in society (Hayek’s insights)
  • The impossibility of the socialist calculation (Mises’s insights) and the millions of lives lost from socialism.
  • The public policy making process – problem identification all the way to cost-benefit test
  • The shortcomings of a cost-benefit test
  • India’s history of liberalism (a bit of pre-independence, Shenoy, Rajaji and Masani, Sharad Joshi) – and the uselessness of think tanks.
  • The control over India since independence by collectivist ideologies like socialism and Hindutva. Historical relationship between Hindutva and Nazi fascism.
  • What is wrong with RSS and Deendayal Upadhyaya? What is wrong with AAP and such “good” efforts?
  • The distortion of the institutions of India by the collectivists and the inevitability of mass-scale corruption
  • What distinguishes the West (including Japan, Singapore and Hong Kong) from India?
  • How has China progressed so quickly?
  • What can we learn from Singapore?
  • The design of a good governance system
  • Local government
  • Judicial reforms
  • Defence policy and foreign policy
  • Freedom of speech
  • Freedom of trade and occupation
  • Property rights
  • Example: Agriculture policy
  • Example: Education policy (primary, secondary, vocational, tertiary)
  • Example: Urban planning
  • Example: Transport (roads, rail, air)
  • Example: Health
  • Example: Environment and waste management (including “Swachh Bharat”)
  • Example: Energy (electricity, gas, oil), water (including ground water)
  • Example: Heritage and archaeology
  • Example: Mining
  • Example:  Defence production
  • Example: Equal opportunity and reservations
  • Any other relevant policy/ strategy topic

A training manual is being prepared for the party. This manual will be refined through this training workshop.

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स्वर्ण भारत पार्टी की ऑडियोलॉजी क्या है?

I have just figured out how to use Hindi dictation in google docs. I’m enormously impressed. Its accuracy is close to 99.5 per cent. Amazing!

So now I will start writing Hindi blog posts more regularly, and also work to convert most SBP material into Hindi.

Here goes the first one (I’ve dictated this in around 20 minutes flat, with very few corrections – actually there were a few typos, some of which got cleared in the second round of edits):

भारत की सारी पार्टियां समाजवादी हैं, यानी, उनके हिसाब से सरकार हर व्यक्ति पर पाबंदी लगा सकती है कि वह क्या काम करें, और जो उसकी कमाई और संपत्ति होती है – और उसकी जमीन और जायदाद – उस पर सरकार का पहला हक बनता है.

कुछ लोग कहते हैं कि भारत समाजवादी नहीं है, पूंजीवादी बन गया है. यह एक मजाक के अलावा और कुछ नहीं. अभी भी हमारे भारत के संविधान में शेडूल 9 (जो कि हमारे original संविधान में नहीं था) के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति एक सीमा से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता है. उस सीमा से ज्यादा होने के बाद वह सारी जमीन सरकार ज़ब्त कर लेती है.

जब किसी आदमी को अपनी जमीन का भी अधिकार नहीं तो इस देश को पूंजीवादी देश कैसे कह सकते हैं?

चलिए, मानते हैं (for the sake of argument) कि जमीन का एक सीमा से ऊपर किसी आदमी का कोई हक नहीं. तो कम से कम वह अपनी फैक्ट्री तो खोल सकता है?

पर यहां भी बहुत क़िस्म की रोक-टोक है. यह ठीक बात है कि एक जमाने में जो लाइसेंस राज था, उसको कुछ हद तक 1991 के रिफॉर्म्स ने हटा दिया है. पहले केवल सरकार ही हवाई एयरलाइंस चला सकती थी, अब प्राइवेट एयरलाइंस भी अपनी बिजनेस चला सकते हैं. इस प्रकार से कुछ क्षेत्र हैं, जैसे कि टेलीकॉम, जिनमें अब भारत में genuine competition है और आम आदमी का बहुत फायदा हुआ है. पर अभी तक किस खुशी में सरकार एयर इंडिया, इंडियन एयरलाइंस, अशोका होटल वगैरह, वगैरह चलाती है? उसके अलावा सबसे ज्यादा समाजवादी नीति तो सरकारी बैंकों की है.

सरकार का किस खुशी में बिजनेस चलाने का काम होता है? केवल समाजवाद यह कहता है कि सरकार बिजनेस करेगी.

उसके अलावा सरकार ने भारत के करोड़ो किसानों की हालत खराब करके रखी है क्योंकि सरकार उनके हर काम पर बाधा डालती है और कई जगह पर खुद ही बैठकर बिजनेस करती है. जो सरकार का मूल काम होता है – यानी कि सड़कें बनाए, बिजली व पानी व्यवस्था का प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के through संपूर्ण सप्लाई करवाए  – वह तो सरकार करने को तैयार नहीं. पर कृषि उत्पाद का बिजनेस जरूर करती है.

इसे आप पूंजीवाद कहते हैं? यह तो पक्का समाजवाद है.

पर अब आप हमारी प्रशासकीय व्यवस्था को देखिए. इसको केवल समाजवादी कह सकते हैं और कुछ नहीं. इस व्यवस्था में कोई जवाबदेही का नाम ही नहीं है. उसके अलावा सरकारी कर्मचारियों का वेतन प्राइवेट सेक्टर से बहुत कम होता है. यह इसलिए होता है क्योंकि हर पार्टी समाजवादी है और चाहती है कि जहां तक संभव हो, हर सरकारी कर्मचारी एक बराबर या समान वेतन पाए. इस वेतन की बराबरी की वजह से हर जगह करप्शन और सरकारी बेवकूफियां जबरदस्त किस्म से फैली हुई है.

यह सबसे ज्यादा व्यतीत होता है सुरक्षा, न्याय और शिक्षा व्यवस्था में. इन क्षेत्रों में देश के लाखों लोगों को हर प्रकार के कष्ट झेलने पड़ते हैं.  यदि किसी गरीब का कुछ बिगड़ जाता है, जैसे कि उसके ऊपर अत्याचार हो, या चोरी या ढाका, पुलिस के सामने जाकर गिढगिढाना पड़ता है और पुलिस उससे पैसे लिए बिना उसका केस भी रजिस्टर नहीं करती. यदि किसी प्रकार से उसका केस रजिस्टर हो कर उसका इंवेस्टिगेशन होता है – वह भी कई सालों बाद – और वह केस कोर्ट में जाता है, तो वहां पर जबरदस्त किस्म के पैसे-खोर जमा रहते हैं. यह सभी जानते हैं कि भारत के कई जज भी घूस लेते हैं. और यह सब क्यों होता है – क्योंकि यह सारी व्यवस्था समाजवादी ढांचे पर बनी हुई है जिसमें जवाबदेही का कोई सवाल ही नहीं.

अब देखिए स्कूलों की हालत. सरकारी स्कूलों में टीचरों को अच्छा खासा पैसा मिलता है पर उसमें से कुछ ही टीचर स्कूल जाकर पढ़ाते हैं. इसलिए गरीब लोग भी अपने बच्चों को किसी ना किसी प्राइवेट स्कूल में डालने की कोशिश करते हैं, जिसमें कम से कम कुछ तो पढ़ाया जाता है.

यह सारी बातें हैं मैंने बहुत विस्तार में अपनी किताब ब्रेकिंग फ्री ऑफ़ नेहरू में समझाई हैं.

नेहरू का समाजवाद से बहुत प्रेम था. नेहरु ही नहीं, उस जमाने में शायद ही कोई कोई हो जो समाजवाद में विश्वास नहीं रखता हो.

पर कुछ तो लोग थे जो समाजवाद का विरोध करते थे – उनमें से सरदार पटेल और राजाजी. राजाजी ने तो 80 साल की उम्र के बाद भी 1959 मैं एक नई पार्टी बनाई, स्वतंत्र पार्टी, जिसका कहना था कि नेहरू ने जो समाजवादी व्यवस्था देश में लागु की है, वो देश के लिए घातक है.

उस ज़माने में कुछ अच्छे बिजनेसमैन होते थे, जैसे कि जे. आर. डी. टाटा, जिन्होंने राजाजी की पार्टी को पैसे दिए – और कुछ अच्छे लोगों ने भी मिल जुलकर इस पार्टी को support किया, जिससे कि स्वतंत्र पार्टी को 1967 की लोकसभा में 44 सीटें मिली. स्वतंत्र पार्टी में ideological clarity बहुत ही कम लोगों में थी, और उसके अलावा उस पार्टी में कई रईस और पुराने महाराजाओं का भी योगदान रहा, जिन्हें केवल पावर से ही मतलब था.

यह पार्टी 1974 मैं खत्म हो गई और उसके बाद केवल शरद जोशी की स्वतंत्र भारत पार्टी ने समाजवाद का विरोध करने की कोशिश की. पर वे भी इस कोशिश में असफल रहे और देश अब समाजवाद की बर्बादी को पूरी तरह महसूस कर रहा है. हमारे सारी की सारी व्यवस्था पूरी बैठ चुकी है.

दुःख होता है कि कई बेवकूफ लोग, जैसे कि मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल, हमारे देश के लोगों का अभी भी अच्छा-खासा उल्लू बना रहे हैं. हो सकता है कि इनमें से कुछ लोगों की नियत अच्छी हो, हालांकि यह कहना मुश्किल है, परंतु इन बेवकूफों की नीतियां इतनी बर्बाद हैं कि देश की हालत खस्ता से और खस्ता होती जा रही है.

इसी वजह से – की भारत को किसी प्रकार से बचाया जाए और देश को आगे ले जाए जाए – स्वर्ण भारत पार्टी का गठन हुआ है.

यह पार्टी एक रजिस्टर्ड पार्टी है, और 26 जनवरी 2016 से भारत को एक लिबरल दिशा, एक पूंजीवादी दिशा, एक सही नीतियों की दिशा, दिखाने पर तत्पर है.

हमारा यह कहना है यदि हमारे manifesto की नीतियां लागू की जाएं और हमारी व्यवस्था का संपूर्ण परिवर्तन किया जाए (जिस प्रकार से हमारे manifesto में लिखा है), तो देश की कुल आमदनी कम से कम 10 गुणा केवल 10 या 15 वर्षों में हो सकती है. उसके अलावा सबसे ज्यादा जरूरी – यानी सुरक्षा और न्याय – यह सब बहुत जल्दी उपलब्ध हो सकते हैं .

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The case for Swarna Bharat Party as India’s national liberal party

I took life membership of Sharad Joshi’s Swatantra Bharat Party in January 2004 and became member of its National Executive.

But around 18 months later, in mid-2005, I resigned after I found significant organisational issues with the party. Sharad Joshi, an excellent liberal and leader, was not internet savvy and therefore unable to effectively communicate about the party. There seemed to be no obvious process to audit accounts and I was unable to get any understanding about how the party actually worked.

I still have the record of the hundreds of emails I exchanged with national executive members of the party (I had started a mailing group) – and how difficult it was to get any response from Sharad Joshi. Sometimes for months on end.

That’s not the kind of liberal party I had wanted to be part of, when I started this project in February 1998.

But there was another thing as well. Sharad Joshi gave us his manifesto to accept “as is”. There was no opportunity to review and improve it. Unfortunately, while Swatantra Bharat Party’s manifesto (drafted by Sharad Joshi) was very good, it failed to detail the governance reforms that are essential to good governance.

Sharad Joshi was an excellent thinker but did not have Lee Kuan Yew’s intuitive understanding of governance.

I kept in touch with Sharad Joshi – whom I greatly admired – over the years, and in 2014 when I was launching the Sone Ki Chidiya movement (as a preparatory process for launching a liberal political party), I obtained from him the copy of the 2014 Swatantra Bharat Party’s manifesto.

I used many chunks from this manifesto without any change in preparing the draft reform agenda (which later became Swarna Bharat Party’s manifesto).

However, the Swatantra Bharat Party manifesto continued to be weak in many areas and required strengthening. I spent many weeks in doing so, in the process digging deep into my studies and work in this area since 1998.

The current version of Swarna Bharat Party’s manifesto is close to the best it can be (although there around 10 areas that I’ve identified for improvement in the coming months/years).

In the end, an ideological political party (as all liberal parties are) is nothing but its manifesto. Its name is irrelevant, its leadership is irrelevant. What is relevant is its manifesto, i.e. what it intends to deliver, and how it intends to do so.

As far as I’m concerned, I’m prepared to stand behind anyone who will take the SBP manifesto to the people and get it implemented.

Over the years I tried influencing Lok Satta Party, Jago Party, Aam Aadmi Party, Navbharat Party, Liberal Democratic Party and others to consider these reforms. They did not adopt these reforms.

Therefore, in July 2014, a small team of liberal leaders decided to go it alone with newly registered Swarna Bharat Party – with the manifesto as the masthead.

Swarna Bharat Party is nothing but its manifesto. The manifesto is the reason for its existence, and the manifesto is open to improvement.

There is no point even in remotely considering any sub-standard “common minimum program” document as part of any coalition. Why settle for anything but the best?

Our manifesto is the best not only in India but in the world. This manifesto is the only way to liberate India and ensure the prosperity of its people. Why should anyone settle for less?

I invite all persons associated with Swatantra Bharat Party to join Swarna Bharat Party without any hesitation – and to take on senior roles in the party immediately.

Over the past twenty years, I have finally managed to build the only party in India that issues its annual report and publishes all its audited accounts. We have to improve the party’s constitution but we are compliant with Election Commission’s requirements.

I’m satisfied that Swarna Bharat Party is the national liberal party of India in every sense that I intended when I started this project 20 years ago.

Yes, it is small, but that’s the way everything begins.

If liberals want to achieve results in their lifetime, they must unite.

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First report from the 2-day SBP Young Leaders Workshop in Allahabad on 5 and 6 April 2018

Liberalism cannot succeed in India without thousands of high quality leaders. The search for leaders is pressing and urgent. Everything depends on finding great leaders.

In 2007, after having experienced first hand the total vacuum of liberal leadership in India, I had started the Freedom Team of India.

Typical of my (somewhat similar) previous experience with India Policy Institute, hundreds of middle class internet savvy people joined it. The difference this time was that FTI required everyone to commit in-principle to contesting elections under the banner of liberty. Of course, we now know that the leadership vacuum remains as big as it was 20 years ago. When the time came to contest (when SBP sought nominations for the 2019 elections), only one of the early FTI members – Rahul Pandit – came forward. (We did get a total of four candidates, of course, and I’m hoping we can announce at least a few more candidates.)

So, earlier this year – more than 10 years after floating FTI – I suggested we try a different approach: that we hold a young leaders workshop– where we’d invite young leaders mainly from Hindi speaking states and hopefully find high quality talent that could be moulded into top-notch liberal leadership.

I’m grateful that Anil Sharma and the Bhadohi SBP team made this workshop a reality – on 5 and 6 April in Allahabad. They organised it wonderfully well, as they have been doing all their activities in Eastern UP.

I was pretty despondent about this experiment, given the poor response this event got over FacebookBut it turns out the workshop can be ranked as a modest success, – not a failure.

The key to this has been the work that the Bhadohi team has been doing on the ground. This work has activated numerous networks in Eastern UP. It is through these networks that around 12 persons were identified and attended. In particular, there was a strong team from Ballia district.

SBP’s workshop organisers (mainly Anil and Rabi, but also Kamal, Rahul and a few others) are travelling back to their respective homes as I write this. The workshop was also attended by Anil Ghanwat, President of Shetkari Sangathana – who wanted to understand SBP better.

I don’t have a detailed report yet (phone connectivity in Allahabad is particularly poor + timezone issues which make it impossible to talk to people in the evening IST), but through short telephonic and Whatsapp updates I gather that a few young leaders have been shortlisted for further engagement. A key issue now would be the ideological induction and training of these young leaders.

Within a few weeks we’ll know whether it was worthwhile to hold this workshop and whether we should try to hold more in the coming months and years.

Rahul Pandit speaking to participants of the Young Leaders Workshop in Allahabad on 5 April 2018 (also present are a few SBP leaders).

Photograph from the second day (the Ballia team had to go back because of unavoidable reasons):

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