Thoughts on economics and liberty

A second draft of the Blueprint for the Abhinav Bharat Abhiyan (अभिनव भारत अभियान)

Based on the feedback received here, I’m updating the preliminary draft blueprint:

Blueprint for New India

अभिनव भारत का यह नक्शा हमारी व्यवस्था को पूर्ण रूप से बदलने के लिए बनाया जा रहा है.

इस अभिनव भारत का नक्शा बहुत ही सरल है, क्योंकि यह हमारी संस्कृति के मूल सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है. यह कहना ठीक होगा कि यही सिद्धांत राम राज्य में पाए जाते थे. आज यही सिद्धांत सारे विश्व में अपनाए गए हैं जहाँ भी कोई देश प्रगति कर रहा है.

जिस प्रकार से विज्ञानं भारतीय नहीं होता,उसी प्रकार से अर्थशास्त्र या राजनीती भारतीय नहीं होती. जो भी सिद्धांत श्रेष्ठा होते हैं वे सारे विश्व में अपनाये गए हैं. हमारे पूर्वजों ने शोध के पश्चात अर्थशास्त्र व् राजनीती के कुछ मूल तत्वों को खोजा था, जो सारे विश्व भर में लागु हो रहे हैं – परन्तु भारत में नहीं.

भारतीय संस्कृति के कुछ मूल सिद्धांत

भारतीय संस्कृति में कुछ साधारण बातें हैं जो जो आज़ाद भारत की व्यवस्था में सम्मिलित नहीं हुईं, और जिनको हम सम्मिलित करना चाहते हैं.

1. जहां का राजा हो व्यापारी वहां की प्रजा हो भिखारी

हमारे यहां एक कहावत है कि “जहां का राजा हो व्यापारी वहां की प्रजा हो भिखारी”. यह कहावत बहुत महत्व रखती है क्योंकि इसमें राजनीती का निचोड़ है. राम राज्य में राजा केवल सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था करता है. रामायण में राम कोई भी व्यापार नहीं चलाते थे.

केवल  राम नाम जपने से भारत का कुछ नहीं होने वाला. राम राज्य के मूल तत्व क्या होते हैं यह हमें पहले समझना पड़ेगा.

हमारे देश का दुर्भाग्य यह हुआ कि 1947 के बाद हमारी सरकारों ने व्यापार का धंधा शुरू कर दिया. आज तक हमारी सरकारें व्यापारी बनी हुई हैं. यह सरकारें बैंक, होटल, एयरलाइन, कारखाने और अन्य किस्म के व्यापार चलाती हैं.

और जो काम सरकार को करना चाहिए वह नहीं करती. यहां कोई जवाबदेही नहीं है और सरकारी कर्मचारी देश को लूटने में मग्न है.

हमने एक विचित्र प्रकार की सरकार बना कर रखी है जहां पर सरकारी कर्मचारियों की नौकरी 35 साल तक पक्की रहती है और वे चाहे कुछ भी कर ले, नौकरी से नहीं निकले जा सकते. यह समझ नहीं आता कि हमने सरकारी नौकरों को सिर पर क्यों चढ़ा कर रखा हुआ है?

इसी वजह से हमारे देश की पुलिस जनता की रक्षा करने के बजाए, उन पर अत्याचार करती है. और न्याय में इतनी देरी हो जाती है कि जनता कोअपने जीवन के अंतर्गत न्याय ही नहीं मिलता.

2. शुभ लाभ

भारत में किसी भी दुकान में जाएं तो लक्ष्मी देवी के नीचे “शुभ लाभ” और स्वास्तिक बना रहता है. यह इसलिए होता है क्योंकि हमारी संस्कृति में लाभ को शुभ माना जाता है और नुकसान को अशुभ.

इस संबंध में लोभ और लाभ में अंतर जानना जरूरी है. हम जब तक अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरों की सेवा में नहीं लग जाते तब तक हमें लाभ नहीं मिल पाता. इस प्रकार लाभ का दूसरा नाम है “दूसरों की सेवा”.

परंतु नेहरू लाभ को अशुभ मानते थे और उन्होंने समाजवाद को अपनाया जिसमें सरकार ही महत्वपूर्ण व्यापार (commanding heights of the economy) करती है और लाभ को अशुभ माना जाता है. उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने इस बात को और फैलाया और आज तक सरकार बैंक भी चलाती है. ये बैंक भारत के गरीब नागरिक को लूटने का मूल यन्त्र बन गए हैं, और हर साल सर्कार जनता के कर (tax) का पैसा इन बैंकों में उड़ेलती पाई जाती है.

सरकार हमारी नौकर होती है. सरकार का व्यापर से कोई मतलब नहीं होना चाहिए, उसको लाभ से कोई मतलब नहीं होना चाहिए. भारत की जनता अपने ग्राहक की सेवा करके ही मुनाफा पा सकती है. इससे वस्तुओं की कीमतें गिरती हैं और उनके किस्म, गुण, लक्षण व् स्वरूप निखरते हैं.

3. अंधेर नगरी चौपट राजा: टका सेर भाजी, टका सेर काजा

हमारी परंपरा के सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही होती थी. पर जवाबदेही पाने के कुछ नियम होते हैं. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में लिखा है कि सबसे ऊंचे दर्जे के कर्मचारी और नीचे दर्जे के कर्मचारी के वेतन में 800 गुना अंतर होना चाहिए. यह भी लिखा है कि उच्च दर्जे के कर्मचारी यदि निर्धारित काम ना करें तो उनको नौकरी से तुरंत बर्खास्त करना होगा.

जिम्मेदारीपूर्ण पदों के लिए वेतनमान भी उसी अनुसार होने चाहिए. उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों का वेतन अपेक्षाकृत कम होने से जवाबदेही और ईमानदारी दोनो का ही निर्धारण होना मुश्किल हो जाता है.

परंतु भारत की समाजवादी व्यवस्था में उच्च और नीचे के कर्मचारियों के वेतन में कोई ज्यादा अंतर नहीं है, और उच्च कर्मचारियों को (यानी कि IAS ऑफिसर्स को) नौकरी से नहीं निकाला जा सकता.

4. विनाशकाले विपरीत बुद्धि

हमारे भारत की संस्कृति की जो परंपराएं हैं वही आजकल के आधुनिक अर्थशास्त्र में पाई जाती हैं, परंतु भारत में परंपरा हम भूल गए और सबसे पीछे हो गए हैं . इतनी देर में बाकी देश इसी परंपरा के निचोड़ की, या दिशा की, पालन करते हुए बहुत आगे निकल चुके हैं.

नेहरू और बाकी समाजवादियों (जिनमें आज की सरकार का उल्लेख करना पढ़ेगा) की विपरीत बुद्धि ने भारत की दुर्गति इस प्रकार बना दी है कि यहां अब जीना ही मुश्किल हो गया है.

विपरीत बुद्धि से सर्वनाश होना निश्चित है – यह भी हमारी परंपरा मैं कहना है.

अब हम इस समाजवादी विपरीत बुद्धि को छोड़ अपनी परंपरा की मुख्य तत्वों को फिर अपनाएं और नए भारत का निर्माण करें.

इस व्यवस्था को हम संक्षिप्त में कह सकते हैं कि: Least government, maximum governance.

कुछ प्रश्न

इस रूपरेखा पर कुछ सवाल उठ सकते हैं. उनको समझना जरूरी है.

  1. क्या इस रूपरेखा से किसानों की आमदनी बढ़ेगी?

किसानों के ऊपर सरकारों ने ७० वर्षों से सख्त बाधाएं लागू के हुई हैं. इन बाधाओं के बारे में विस्तार में अमर हबीब ने लिखा है. उनको हटाया जाए. इससे किसानों की आमदनी भी बढ़नी शुरू हो जाएगी.

2. सरकारी कर्मचारी और किसानों की वेतन में इतना अंतर क्यों?

हम एक जवाबदेह कर्मचारियों की नियुक्ति करेंगे तो उनको अच्छा वेतन भी मिलना चाहिए, पर वे यदि काम ढंग से न करें दो उनकी नौकरी तुरंत जानी चाहिए. सरकार अपना काम ढंग से जब करेगी तो जनता अपना काम खूबियत से कर पाएंगे. इससे यह होगा कि जहां भी अच्छा मौका मिले वहां लोग जाकर नौकरी करेंगे. किसानों के बच्चे पढ़ लिखकर ज्ञान पाकर नए अविष्कार करेंगे और देश को प्रगतिशील बनाएंगे. सारे विश्व में सबसे महत्वपूर्ण आमदनी उन लोगों की होती है जो नए अविष्कार करके विश्व को आगे ले जाते हैं. हमें सामान गरीबी ना करते हुए सब को ज्यादा ज्ञान पाने के मौके मिलें – ऐसा एक देश बनाना पड़ेगा.

3. कई बार देखने को आया है कि निजी संस्थाएं (यानि की प्राइवेट सेक्टर) में काम अच्छा होता है परंतु खर्चीला भी अधिक होता है. इसे आम आदमी उन सुविधाओं को प्राप्त नहीं कर पाता.

ऐसा कभी कभार लगता है, परंतु यदि हम ध्यान से देखते हैं तो पता चलता है कि जहां भी निजी प्रतियोगिता होती है (competition) वहां पर उसका स्तर बढ़ जाता है, यानी कि काम अच्छा होता है, और उसके दाम भी कम हो जाते हैं. ऐसे बहुत उदाहरण हैं, जैसे कि telephone जो आजकल competition की वजह से सस्ते हो गए हैं. हम में से बुज़ुर्गों को याद होगा वह ज़माना जब इन्हें सरकार चलाती थी और वे बहुत महंगे होते थे.

यह जरूरी रहेगा की गरीब बच्चों को, और गरीब परिवारों को, शिक्षा और स्ववास्थ्य की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए subsidy दी जाये. इसके अलावा, जहां पर monopoly हो, वहां पर सरकारी नियंत्रण (regulation) जरूरी है. पर यह जरूरी है समझना कि बिना सरकार के ऊपर नियंत्रण किए, और सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही का बंदोबस्त किये, private sector पर उचित नियंत्रण रखना असंभव है.

4. ऐसी व्यवस्था में भारतीय संस्कृति और मूल्यों का पालन किस प्रकार से होगा?

जैसा कि हमने देखा सरकार केवल कुछ नियमित काम करने के लिए नियुक्त की जाती है. हमारे नौकर होने की हैसियत से सरकार का हमें अपने मूल्यों के बारे में बताने का कोई अधिकार नहीं रहेगा .

अभिनव भारत की संस्कृति और मूल्य हम भारतीय खुद बनाएंगे. गुणवान सांस्कृतिक नेताओं को हम खुद ढूंढ कर उनसे प्रेरणा लेंगे. सरकार का संस्कृति से कोई संबंध नहीं रहेगा, उसका काम केवल अपने नियमित कार्य करना ही रहेगा।

अभिनव भारत की सरकार क्या करेगी और कैसे करेगी

सरकार क्या काम करे यह नए भारत के नक़्शे का पहला बिंदु होगा. अभिनव भारत की सरकार जनता की नौकर बनकर वही काम करेगी जो जो सरकार के लिए जायज़ हो और सौंपा गया हो – यानी हमारी सुरक्षा और न्याय, और शायद कुछ सड़के बनाना. उसके अलावा सारे काम जनता खुद करेगी. और सरकार को जो सौंपा जाये उसके लिए वह पूरी तरह जवाबदेह होगी.

अभिनव भारत की सरकार कभी व्यापर नहीं करेगी. सरकार जनता को अपने विभिन्न व्यापर करने में बाधा नहीं डालेगी. किसान विरोधी कानून हटाएगी और उच्चतम तकनीक का इस्तेमाल करने से जनता को नहीं रोकेगी.

अभिनव भारत में हर गरीब को सरकार की तरफ से social insurance की हैसियत से कुछ सीमित संसाधन मिलेंगे जिससे वह frugal condition में जी पाये, और उनके बच्चों को अच्छे स्कूलों में जाने का अवसर मिलें . सरकार खुद स्कूल इत्यादि नहीं चलाएगी, गरीबों को school voucher मिलेंगे.

इसी प्रकार, सरकार हमारी सेहत का ध्यान नहीं करेगी, ना ही अस्पताल चलाएगी, परंतु जो गरीब से गरीब है उसके लिए social insurance की तरफ से कुछ health voucher का बंदोबस्त करेगी .

अभिनव भारत की सरकार जनता की नौकर की हैसियत से जनता को, यानि की अपने मालिक को , यह कभी नहीं कहेगी कि हम क्या खा सकते हैं, पी सकते हैं, पहन सकते हैं, और किस प्रकार से रहन सहन करेंगे. राम ना हिन्दू थे न मुस्लिम, और यदि राम राज्य में नास्तिक ही क्यों ना हो, राम का राजधर्म केवल सबको सुरक्षा और न्याय प्रदान करना था. उन्होंने कहीं नहीं कहा की उनके नाम पर इमारतें गिरायी जाएं. ऐसे लोग राक्षसः होते हैं, राम के धर्म के दुश्मन.

अभिनव भारत का दूसरा बिंदु होगा जवाबदेही.

अभिनव भारत में किसी भी सरकारी कर्मचारी की नौकरी पक्की नहीं होगी और यदि वह काम उचित रूप से नहीं करता तो उसको तुरंत नौकरी से निकाला जाएगा. इसी प्रकार से सारे विश्व में सरकारें चलती हैं.

विस्तार में क्या करना होगा?

अभिनव भारत बनाने के लिए हमें भारतीय संविधान को ध्यान से देखना पड़ेगा. उसमें पिछले 70 सालों में कई प्रकार के संशोधन हुए हैं जिनकी वजह से सरकार अपने कार्यक्षेत्र की सिमा के बहुत बाहर कार्य कर रही है. वह न केवल व्यापार कर रही है, वह किसानों को व्यापर करने से रोक रही है.

इस प्रकार की शक्तियां हम सरकार से वापस लेकर जनता को फिर सौंप देंगे.

यह रही अभिनव भारत के नक्शे की एक outline. विस्तार में इस नक्शे को भरने के लिए अच्छे अर्थशास्त्री और नीतिज्ञों से हम संपर्क करके इसको आगे बढ़ाएंगे.

Sanjeev Sabhlok

View more posts from this author