Thoughts on economics and liberty

स्वराज्य (स्वराज, या स्वाधीनता)और आज़ादी में बहुत अंतर है

हम आज़ाद क्यों होना चाहते थे? निश्चित रूप से हमें ब्रिटिश राज से छुटकारा पाना ज़रूरी था. जलियांवाला बाग जैसे जुल्मों ने ब्रिटिश राज का असली रूप दिखा दिया था.

पर खुद का राज करना एक बात है, जनता की आजादी एक दूसरी ही बात है. आज हम खुद पर राज ज़रूर करते हैं, पर हम आज़ाद नहीं हैं.

आज़ादी की आजादी पर दो किस्मत के नियंत्रण होते हैं: समाज की तरफ से, और सरकार की तरफ से.

भारत की समाज ने हमें जंजीरो से बांध रखा है. पर ये जंजीरे खुद की होती हैं, और आदमी चाहे तो इन जंजीरो को उतार कर फेंके सकता है.

पर सरकारी हस्तक्षेप और ही कुछ चीज़ होती है. समाजवाद होने के कारण हमने सब कुछ सरकार को सौंप दिया और सरकार ने बहुत सारे नए नियम बनाकर लोगों को ज़ंजीरों में बांध दिया.

एक ज़माने में लाइसेंस राज चलता था. 1991 के पश्चात कुछ कम हुआ है, परंतु अब भी बहुत किस्मों की रोक है. स्वराज्य का फायदा तभी होगा जब जनता को आज़ादी मिलेगी.

रविंद्रनाथ टैगोर ने एक कविता लिखी थी: “हैवान ऑफ फ्रीडम”:

Heaven of Freedom (by Rabindranath Tagore: Gitanjali)

Where the mind is without fear and the head is held high;

Where knowledge is free;

Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls;

Where words come out from the depth of truth;

Where tireless striving stretches its arms towards perfection;

Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit;

Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action—

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

इस कविता में उन्होंने कहा कि आजादी सबसे महत्वपूर्ण होती है. उन्होंने एक ऐसे भारत का सपना देखा जिसमे हम आपस की दीवारें तोड़ दें, जिसमें सत्य का बोलबाला हो, जिसमे  पुरानी आदतें हमारी विचार-शक्ति को नष्ट न कर पाएं.

पर स्वाधीनता पाने के बाद हमें आज़ादी का रास्ता दिखने वाला कोई नहीं था. नेहरू का समाजवाद आज़दी के विरुद्ध था और ब्रिटिश राज का सरकारी ढांचा (जैसे कि IAS वगैरह) वैसा का वैसा चलता रहा, जिसमे जनता को जवाबदेही बिलकुल नहीं मिल सकती.

टैगोर केवल स्वराज नहीं चाहते थे क्योंकि स्वराज एक छोटी सी बात होती है. उसमें सिर्फ गोरे साहब को हटाकर भूरे साहब राज करना शुरु करते हैं. पर असलियत में स्वराज तब मिलेगा जब हर आदमी अपने पर खुद का राज कर पाये, यानी वह आजाद हो, अपनी क्षमता से जो काम करना चाहे वह करें – जब तक कि वह किसी और का  पदार्थिक  नुकसान नहीं करता.

स्वर्ण भारत पार्टी भारत की पहले पार्टी है जो भारत को आजाद होने का रास्ता दिखा रही है, जिसमे जनता मालिक होती है, जिसमे सरकार जवाबदेह होती है. जब सरकार सुरक्षा और न्याय देने का काम अच्छी तरह करेगी, तो जनता बाकि काम खुद ही कर लेगी.

Sanjeev Sabhlok

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One thought on “स्वराज्य (स्वराज, या स्वाधीनता)और आज़ादी में बहुत अंतर है
  1. Raj

    I really like it. Only if Rabindranath had the mettle to do more for the advancement of freedom, than stop at poetry.

     

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