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स्वर्ण भारत पार्टी की ऑडियोलॉजी क्या है?

I have just figured out how to use Hindi dictation in google docs. I’m enormously impressed. Its accuracy is close to 99.5 per cent. Amazing!

So now I will start writing Hindi blog posts more regularly, and also work to convert most SBP material into Hindi.

Here goes the first one (I’ve dictated this in around 20 minutes flat, with very few corrections – actually there were a few typos, some of which got cleared in the second round of edits):

भारत की सारी पार्टियां समाजवादी हैं, यानी, उनके हिसाब से सरकार हर व्यक्ति पर पाबंदी लगा सकती है कि वह क्या काम करें, और जो उसकी कमाई और संपत्ति होती है – और उसकी जमीन और जायदाद – उस पर सरकार का पहला हक बनता है.

कुछ लोग कहते हैं कि भारत समाजवादी नहीं है, पूंजीवादी बन गया है. यह एक मजाक के अलावा और कुछ नहीं. अभी भी हमारे भारत के संविधान में शेडूल 9 (जो कि हमारे original संविधान में नहीं था) के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति एक सीमा से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता है. उस सीमा से ज्यादा होने के बाद वह सारी जमीन सरकार ज़ब्त कर लेती है.

जब किसी आदमी को अपनी जमीन का भी अधिकार नहीं तो इस देश को पूंजीवादी देश कैसे कह सकते हैं?

चलिए, मानते हैं (for the sake of argument) कि जमीन का एक सीमा से ऊपर किसी आदमी का कोई हक नहीं. तो कम से कम वह अपनी फैक्ट्री तो खोल सकता है?

पर यहां भी बहुत क़िस्म की रोक-टोक है. यह ठीक बात है कि एक जमाने में जो लाइसेंस राज था, उसको कुछ हद तक 1991 के रिफॉर्म्स ने हटा दिया है. पहले केवल सरकार ही हवाई एयरलाइंस चला सकती थी, अब प्राइवेट एयरलाइंस भी अपनी बिजनेस चला सकते हैं. इस प्रकार से कुछ क्षेत्र हैं, जैसे कि टेलीकॉम, जिनमें अब भारत में genuine competition है और आम आदमी का बहुत फायदा हुआ है. पर अभी तक किस खुशी में सरकार एयर इंडिया, इंडियन एयरलाइंस, अशोका होटल वगैरह, वगैरह चलाती है? उसके अलावा सबसे ज्यादा समाजवादी नीति तो सरकारी बैंकों की है.

सरकार का किस खुशी में बिजनेस चलाने का काम होता है? केवल समाजवाद यह कहता है कि सरकार बिजनेस करेगी.

उसके अलावा सरकार ने भारत के करोड़ो किसानों की हालत खराब करके रखी है क्योंकि सरकार उनके हर काम पर बाधा डालती है और कई जगह पर खुद ही बैठकर बिजनेस करती है. जो सरकार का मूल काम होता है – यानी कि सड़कें बनाए, बिजली व पानी व्यवस्था का प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के through संपूर्ण सप्लाई करवाए  – वह तो सरकार करने को तैयार नहीं. पर कृषि उत्पाद का बिजनेस जरूर करती है.

इसे आप पूंजीवाद कहते हैं? यह तो पक्का समाजवाद है.

पर अब आप हमारी प्रशासकीय व्यवस्था को देखिए. इसको केवल समाजवादी कह सकते हैं और कुछ नहीं. इस व्यवस्था में कोई जवाबदेही का नाम ही नहीं है. उसके अलावा सरकारी कर्मचारियों का वेतन प्राइवेट सेक्टर से बहुत कम होता है. यह इसलिए होता है क्योंकि हर पार्टी समाजवादी है और चाहती है कि जहां तक संभव हो, हर सरकारी कर्मचारी एक बराबर या समान वेतन पाए. इस वेतन की बराबरी की वजह से हर जगह करप्शन और सरकारी बेवकूफियां जबरदस्त किस्म से फैली हुई है.

यह सबसे ज्यादा व्यतीत होता है सुरक्षा, न्याय और शिक्षा व्यवस्था में. इन क्षेत्रों में देश के लाखों लोगों को हर प्रकार के कष्ट झेलने पड़ते हैं.  यदि किसी गरीब का कुछ बिगड़ जाता है, जैसे कि उसके ऊपर अत्याचार हो, या चोरी या ढाका, पुलिस के सामने जाकर गिढगिढाना पड़ता है और पुलिस उससे पैसे लिए बिना उसका केस भी रजिस्टर नहीं करती. यदि किसी प्रकार से उसका केस रजिस्टर हो कर उसका इंवेस्टिगेशन होता है – वह भी कई सालों बाद – और वह केस कोर्ट में जाता है, तो वहां पर जबरदस्त किस्म के पैसे-खोर जमा रहते हैं. यह सभी जानते हैं कि भारत के कई जज भी घूस लेते हैं. और यह सब क्यों होता है – क्योंकि यह सारी व्यवस्था समाजवादी ढांचे पर बनी हुई है जिसमें जवाबदेही का कोई सवाल ही नहीं.

अब देखिए स्कूलों की हालत. सरकारी स्कूलों में टीचरों को अच्छा खासा पैसा मिलता है पर उसमें से कुछ ही टीचर स्कूल जाकर पढ़ाते हैं. इसलिए गरीब लोग भी अपने बच्चों को किसी ना किसी प्राइवेट स्कूल में डालने की कोशिश करते हैं, जिसमें कम से कम कुछ तो पढ़ाया जाता है.

यह सारी बातें हैं मैंने बहुत विस्तार में अपनी किताब ब्रेकिंग फ्री ऑफ़ नेहरू में समझाई हैं.

नेहरू का समाजवाद से बहुत प्रेम था. नेहरु ही नहीं, उस जमाने में शायद ही कोई कोई हो जो समाजवाद में विश्वास नहीं रखता हो.

पर कुछ तो लोग थे जो समाजवाद का विरोध करते थे – उनमें से सरदार पटेल और राजाजी. राजाजी ने तो 80 साल की उम्र के बाद भी 1959 मैं एक नई पार्टी बनाई, स्वतंत्र पार्टी, जिसका कहना था कि नेहरू ने जो समाजवादी व्यवस्था देश में लागु की है, वो देश के लिए घातक है.

उस ज़माने में कुछ अच्छे बिजनेसमैन होते थे, जैसे कि जे. आर. डी. टाटा, जिन्होंने राजाजी की पार्टी को पैसे दिए – और कुछ अच्छे लोगों ने भी मिल जुलकर इस पार्टी को support किया, जिससे कि स्वतंत्र पार्टी को 1967 की लोकसभा में 44 सीटें मिली. स्वतंत्र पार्टी में ideological clarity बहुत ही कम लोगों में थी, और उसके अलावा उस पार्टी में कई रईस और पुराने महाराजाओं का भी योगदान रहा, जिन्हें केवल पावर से ही मतलब था.

यह पार्टी 1974 मैं खत्म हो गई और उसके बाद केवल शरद जोशी की स्वतंत्र भारत पार्टी ने समाजवाद का विरोध करने की कोशिश की. पर वे भी इस कोशिश में असफल रहे और देश अब समाजवाद की बर्बादी को पूरी तरह महसूस कर रहा है. हमारे सारी की सारी व्यवस्था पूरी बैठ चुकी है.

दुःख होता है कि कई बेवकूफ लोग, जैसे कि मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल, हमारे देश के लोगों का अभी भी अच्छा-खासा उल्लू बना रहे हैं. हो सकता है कि इनमें से कुछ लोगों की नियत अच्छी हो, हालांकि यह कहना मुश्किल है, परंतु इन बेवकूफों की नीतियां इतनी बर्बाद हैं कि देश की हालत खस्ता से और खस्ता होती जा रही है.

इसी वजह से – की भारत को किसी प्रकार से बचाया जाए और देश को आगे ले जाए जाए – स्वर्ण भारत पार्टी का गठन हुआ है.

यह पार्टी एक रजिस्टर्ड पार्टी है, और 26 जनवरी 2016 से भारत को एक लिबरल दिशा, एक पूंजीवादी दिशा, एक सही नीतियों की दिशा, दिखाने पर तत्पर है.

हमारा यह कहना है यदि हमारे manifesto की नीतियां लागू की जाएं और हमारी व्यवस्था का संपूर्ण परिवर्तन किया जाए (जिस प्रकार से हमारे manifesto में लिखा है), तो देश की कुल आमदनी कम से कम 10 गुणा केवल 10 या 15 वर्षों में हो सकती है. उसके अलावा सबसे ज्यादा जरूरी – यानी सुरक्षा और न्याय – यह सब बहुत जल्दी उपलब्ध हो सकते हैं .

Sanjeev Sabhlok

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